A tough lesson I’ve personally learned is that life is unpredictable and sometimes unfair . You can’t control everything that happens to you or around you, and sometimes you have to face situations that are painful, challenging, or disappointing. You may lose someone you love, fail at something you worked hard for, or face injustice or discrimination. These experiences can make you feel angry, sad, or hopeless, but they can also teach you valuable lessons. Some of the lessons I've learned from difficult times are: Humility : I learned to accept my limitations and mistakes, and to appreciate the things I have. I also learned to respect and empathize with others who are going through hard times. Gratitude : I learned to count my blessings and be thankful for the people and opportunities in my life. I also learned to express my gratitude and kindness to others and to not take anything for granted. Resilience : I learned to overcome obstacles and bounce back from setbacks. I also learn...
धनतेरस : शास्त्रों में कहा गया है कि समुंद्र मंथन के दौरान कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि अपने दोनों हाथों में कलश लेकर समुंद्र से प्रकट हुए थे। धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंश अवतार माना जाता है। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं।
समुद्र मंथन
देवताओं और दानवों ने मिलकर किया था समुद्र मंथन | इस कथा का संदेश ये है कि हमें मंथन करके बुरे विचारों का त्याग करना चाहिए और अच्छाई को अपनाना चाहिए।
दीपावली पर देवी लक्ष्मी की पूजा करने का विशेष महत्व है। लक्ष्मी की उत्पत्ति के संबंध में समुद्र मंथन की कथा प्रचलित है। समुद्र मंथन के अंत में भगवान धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।
समुद्र मंथन की कथा ये संदेश देती है कि हमें अपने मन का मंथन करना चाहिए। मन को मथने की क्रिया में सबसे पहले बुरे विचारों को त्यागना चाहिए। समुद्र मंथन से भी सबसे पहले विष ही निकला था, जिसे शिव जी ने अपने गले में धारणकिया था। शिव जी ने विष को गले से नीचे नहीं उतरने दिया, इसका संदेश यही है कि बुराइयों को अपने मन में उतरने न दें।
समुद्र मंथन में कुल 14 रत्न निकले थे। इन सभी रत्नों में जीवन प्रबंधन के सूत्र भी सीखे जा सकते हैं। इन सूत्रों को अपनाने से हमारे जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। जानिए समुद्र मंथन में कौन-कौन से रत्न निकले थे और उनका क्या संदेश है...
समुद्र मंथन में सबसे पहले कालकूट नाम का विष निकला। इस विष को शिवजी ने अपने गले में धारण किया था।
संदेश- मन को मथने पर सबसे पहले बुरे विचार निकलते हैं ।बुराइयों को मन में अंदर उतरने न दें, इनका त्याग करें।
समुद्र मंथन में दूसरे नंबर पर पवित्र कामधेनु गाय निकली थी। इसे ऋषियों ने रख लिया था।
संदेश - जब मन से बुरे विचार निकल जाते हैं तो मन कामधेनु की तरह पवित्र हो जाता है।
तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला था। ये घोड़ा मन की गति से चलता था। इसे असुरों के राजा बलि ने रखा था।
संदेश - जब मन इधर-उधर भटकता है तो वह बुराइयों की ओर ही जाता है।
ऐरावत हाथी
ऐरावत चौथे नंबर पर निकला था। इसे देवराज इंद्र ने रखा था। ऐरावत हाथी शुद्ध बुद्धि का प्रतीक है।
संदेश - मन जब बुराइयों से दूर होगा तो हमारी बुद्धि शुद्ध हो जाएगी। विचार अच्छे रहेंगे तो मन भी शुद्ध रहेगा।
कौस्तुभ मणि
कौस्तुभ मणि पांचवें नंबर पर निकली थी। इसे भगवान विष्णु ने हृदय पर धारण किया था। ये मणि भक्ति की प्रतीक है।
संदेश- जब मन से बुरे विचार निकल जाते हैं, बुद्धि शुद्ध हो जाती है तब मन में भक्ति जागती है। भक्त को ही कृपा मिलती है यानी भगवान के हृदय में स्थान मिलता है।
कल्पवृक्ष
छठे नंबर पर निकला था कल्पवृक्ष। इसे देवताओं ने स्वर्ग में स्थापित किया था। कल्पवृक्ष सभी इच्छाओं को पूरा करने वाला वृक्ष था।
संदेश- भक्ति करते समय और मन का मंथन करते समय इच्छाओं को अलग कर देना चाहिए, जैसा कि देवताओं ने कल्पवृक्ष को समुद्र मंथन से दूर स्वर्ग में स्थापित किया।
सातवें नंबर पर रंभा नाम की अप्सरा निकली थी। रंभा देवता के पास गई थी। ये कामवासना और लालच की प्रतीक है।
संदेश- जब हम भक्ति करते हैं तो हमें कामवासना और लालच जैसी बुराइयों से बचना चाहिए।
आठवें नंबर पर निकलीं देवी लक्ष्मी । लक्ष्मी जी को देवता, दानव और ऋषि सभी अपने साथ रखना चाहते थे, लेकिन लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का वरण किया।
संदेश - लक्ष्मी यानी धन उन लोगों के पास ही रहता है जो कर्म को महत्व देते हैं और धर्म के अनुसार काम करते हैं।
नौवें नंबर पर निकली थी वारुणी देवी। वारुणी को दैत्यों ने ग्रहण किया था। वारुणी यानी मदिरा।
संदेश - मदिरा यानी नशा करना एक बुराई है। नशा करने वाला व्यक्ति बुराइयों की ओर ही जाता है।
दसवें नंबर पर चंद्रमा निकला, जिसे शिवजी ने अपने मस्तक पर धारण किया था। चंद्र शांति और शीतलता का प्रतीक है।
संदेश - जब हमारा मन सभी बुराइयों से दूर हो जाता है तब हमें शांति और शीतलता मिलती है।
पारिजात वृक्ष ग्यारहवें नंबर पर निकला था। इसे छूने से थकान दूर हो जाती थी। इसे भी देवताओं ने ग्रहण किया।
संदेश- जब मन में शांति और शीतलता आ जाती है तब शरीर की थकान भी दूर हो जाती है।
पांचजन्य
बारहवें नंबर पर निकला था पांचजन्य शंख। इसे भगवान विष्णु ने लिया था।
संदेश - ये शंख संदेश देता है कि शांति और थकान दूर होने के बाद हमारा मन भक्ति में लगा रहता है।
तेरहवें और चौदहवें नंबर पर धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार में देवताओं को अमृत का सेवन करवाया था।
संदेश- जब सारी बुराइयां दूर होने के बाद हम भक्ति करते हैं तो हमें अमृत मिलता है यानी हमें भगवान की कृपा मिल जाती है।
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